३० जनवरी १९४८ को "हे राम" कहते जिन प्रतिभा ने इस बिराट संसार का परित्याग किया वो कोई और नहीं बल्कि इस राष्ट्र के राष्ट्र पिता व यूँ कहें तो बीसवीं सदी के महानायक पूज्य बापू महात्मा गांधी थे. अहंकार से परे मानव सेवा और देस भक्ति के दीवाने गांधी, अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने बाले गांधी, जिनके आह्वान पर जन सैलाब उमड़ पड़ता था देस के वो सच्चे सपूत गांधी . साबरमती आश्रम में रामकृष्ण परमहंस व मदर टेरेसा की तरह आरम्भ से ही कूष्ट रोगियों की दिल से सेवा करने बाले व मरहम पट्टी करने बाले गांधी मानो जिनके कथनी और करनी में लेस मात्र भी अंतर न था और न ही कभी जिन्होंने एक गरीब माता की गरीबी को ही भुलाया बल्कि उनके गरीबी से आहात और द्रवित होकर आजीवन ही एक पतली धोती धारण करने का न केवल संकल्प लिया बल्कि निभाया भी वो गांधी . सेवा में मानो माँ की ममता सी निर्मल ह्रदय एवं निर्णय लेने में हिमालय पर्वत सा अडिग व स्थिर चित्त बाले कस्तूरबा-पति गांधी जिनके यह एलान के बाद कि,आश्रम के कोई भी लोग अधिक धन या पैसा नहीं रखेंगे .बाबजूद आदेस के कस्तूरबा गाँधी के पास से चौवान्नी निकलने के बाद आश्रम से निकाले जाने का निर्णय उनके दृढ़ता का परिचायक है. वैसे ये निर्णय काका कालेश्वर के आग्रह पर बदलनी पड़ी किन्तु आश्रम के सभी लोगों के जूठे बर्तन को धोने का निर्णय सर्व मान्य नहीं होने पर भी प्रभावी हो ही गया ,और कस्तूरबा गाँधी को सबका जूता बर्तन धोना पड़ा. ये गांधी जी के दृढ निश्चयी होने का एक और प्रमाण है . उनके शहीद होने पर आइन्स्टीन ने ठीक ही कहा था कि, आने बाले पीढ़ी को शायद यह बिस्वास नहीं ही होगा कि, गांधी जी जैसे हाड़-मांस बाले लोग २० विन सदी में पैदा लिए होंगे .देस के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जिनके शहीद होने पर अपने संदेस में कहा कि "दी लाइट हस गोन". जिनके शहीद होने पर ब्रिद्ध जनों के अनुसार आश्मान में उस समय इन्द्र धनुष उगते देखा जा रहा था जिसमे गांधी जी की छवि को लोग देख रहे थे ,ऐसे देवत्व गुण बाले राम और कृष्ण के उपासक तथा राम चरित मानस एवं गीता के अनुसार आचरण करने बाले गांधी को और उनकी के सहादत को रवींद्र का सलाम !
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