लैटर N0 A-209 प्रकाशनार्थ 02 -10 -11
२ अक्टूबर ११ पेज न० ४ पर कुंदन कुमार सहरसा द्वारा गांधी जी के संस्मरण पर लिखा गया लेख "महिलाओं ने सूत काट बापू को पहनाई थी माला" बेहद रोमांचित करने बाला है. वास्तव इस लेख में राष्ट्र प्रेम की झलक, देस भक्तों का आचरण और गांधी का देस-प्रेम और देस भक्तों के साथ भावनात्मक लगाव को दर्शाता है. एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत कि बर्बरता पूर्ण कार्रवाई चरम पर थी वही दूसरी ओर १९३४ के भूकंप कि घटना ने बापू के दिल को झकझोर कर रख दिया होगा और फिर अपने को नहीं रोक पाने वाले बापू कोशी कि पीड़ा को देखने स्वयं कोशी आ पहुंचे होंगे जहाँ उनका ऐतिहाशिक स्वागत भी किया गया. इसमें एक प्रेरक प्रसंग बस इतना कि, गाँधी जी को स्वयं यहाँ कि माताओं ने अपने हाथों से चरखा चला सूत काट माला पहनायी. सूत काटकर माला पहनाये जाने कि घटना क्या घटी , कोशी की महिलायें चरखा में इतने ब्यस्त हो गयी कि , गाँव में होने बाले रोज के घरेलु-झगडे ही मिट गए.देस भक्तों को सम्मान देने के तौर तरीके, उपहार के स्वरूपों की चर्चा बेहद ह्रदय स्पर्शी व मर्म स्पर्शी तो है ही इसके साथ ही इस प्रसंग से आत्मनिर्भरता को बल भी मिलता है. हम अपनी ओर से आपके इस आर्टिकिल & "स्वस्थ्य-बिचार" के लिए बिशेष रूप से आपको धन्यवाद देते हैं ! माता भगवती दैनिक जागरण परिवार के सभी सदस्यों के ऊपर कृपा बनाये रक्खें !
"रवींद्र"
२ अक्टूबर ११ पेज न० ४ पर कुंदन कुमार सहरसा द्वारा गांधी जी के संस्मरण पर लिखा गया लेख "महिलाओं ने सूत काट बापू को पहनाई थी माला" बेहद रोमांचित करने बाला है. वास्तव इस लेख में राष्ट्र प्रेम की झलक, देस भक्तों का आचरण और गांधी का देस-प्रेम और देस भक्तों के साथ भावनात्मक लगाव को दर्शाता है. एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत कि बर्बरता पूर्ण कार्रवाई चरम पर थी वही दूसरी ओर १९३४ के भूकंप कि घटना ने बापू के दिल को झकझोर कर रख दिया होगा और फिर अपने को नहीं रोक पाने वाले बापू कोशी कि पीड़ा को देखने स्वयं कोशी आ पहुंचे होंगे जहाँ उनका ऐतिहाशिक स्वागत भी किया गया. इसमें एक प्रेरक प्रसंग बस इतना कि, गाँधी जी को स्वयं यहाँ कि माताओं ने अपने हाथों से चरखा चला सूत काट माला पहनायी. सूत काटकर माला पहनाये जाने कि घटना क्या घटी , कोशी की महिलायें चरखा में इतने ब्यस्त हो गयी कि , गाँव में होने बाले रोज के घरेलु-झगडे ही मिट गए.देस भक्तों को सम्मान देने के तौर तरीके, उपहार के स्वरूपों की चर्चा बेहद ह्रदय स्पर्शी व मर्म स्पर्शी तो है ही इसके साथ ही इस प्रसंग से आत्मनिर्भरता को बल भी मिलता है. हम अपनी ओर से आपके इस आर्टिकिल & "स्वस्थ्य-बिचार" के लिए बिशेष रूप से आपको धन्यवाद देते हैं ! माता भगवती दैनिक जागरण परिवार के सभी सदस्यों के ऊपर कृपा बनाये रक्खें !
"रवींद्र"
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